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रविवार, 13 सितंबर 2026

चन्द्र प्रकाश चौधरी की तूलिका ने चित्रों में जीवंत की बस्ती की ऐतिहासिक धरोहर



 बस्ती/गौर। जिले की प्राचीन धरोहरों, ऐतिहासिक इमारतों पौराणिक स्थलों, बस्ती की संस्कृति, और वास्तुकला को अपनी कलात्मक हुनर से कैनवास पर जनपद बस्ती के गौरव ख्याति लब्धि राष्ट्रीय चित्रकार चन्द्र प्रकाश चौधरी जीवंत कर सहेजने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। 
चन्द्र प्रकाश न केवल इन धरोहरों के चित्रों बनाकर उन्हें जीवंत रख रहे हैं बल्कि समय के साथ धुंधली होती जा रही ऐतिहासिक विरासतों को आने वाली पीढ़ियों के लिए उनका चित्रात्मक दस्तावेजीकरण भी कर रहे हैं।
चन्द्र प्रकाश ने बताया कि वह विगत कई महीनो से बस्ती के ऐतिहासिक,पौराणिक और धार्मिक स्थलों का भ्रमण करने के पश्चात उनके मन में यह विचार आया कि जिले की गौरवशाली विरासत को चित्रित करने का पुनीत कार्य किया जाए जो आधुनिकता की चका-चौंध में बिसर गई है और उन्हें पुनः संपूर्ण जनमानस में जीवंत किया जाए। उनके इस मुहिम का मुख्य उद्देश्य आने वाली पीढ़ी को जनपद की समृद्ध विरासत से रूबरू कराना और उपेक्षित ऐतिहासिक स्थलों की ओर प्रशासन व जनता का ध्यान आकर्षित करना है। 

चन्द्र प्रकाश के इस चित्र श्रृंखला में 22 से अधिक पेंटिंग शामिल है जो जल रंग एवं क्रेयान माध्यम से कागज और कैनवास पर बनाए गए हैं जिनमें बस्ती रेलवे स्टेशन, कुआनों नदी तट के समीप स्थित कारगिल शहीद शौर्य स्तंभ, शहीद द्वार छावनी, शिवगुलाम सिंह स्मारक स्थल पैड़ा, श्रीराम जानकी हनुमान शिव दुर्गा मंदिर छावनी, कप्तानगंज चौराहे पर स्थित दुर्गा माता मन्दिर, बाबा भदेश्वर नाथ मंदिर, बाबा बेहिलनाथ मंदिर, दुबौला क्षेत्र में स्थित बाबा भारीनाथ मंदिर, अमोढ़ा रियासत का किला, राजा शिव गुलाम सिंह का किला, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियो में अमोढा़ की रानी तलाश कुंवरि, राजा जालिम सिंह, नगर के राजा उदय प्रताप सिंह, पैड़ा क्षेत्र के राजा शिव गुलाम सिंह, पंडित सीताराम शुक्ल, पिरई खां, इन्द्रासन सिंह और संत महात्माओं में गुरू वशिष्ठ, बाबा निहाल दास, संत तपसी महाराज, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, आदि जैसे विषय उनकी कलात्मक अभिरुचि के प्रमुख उदाहरण हैं। उनकी कला में सिर्फ रंग और रेखाएँ नहीं, बल्कि भावनाएँ, इतिहास और संवेदनाएँ दिखाई देती हैं। चन्द्र प्रकाश की कूंची किसी दृश्य को हूबहू उतारने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उस दृश्य की आत्मा को कागज़ पर जीवंत करने का प्रयास करती है।
अब तक 1000 से अधिक चित्र बना चुके चन्द्र प्रकाश इसके अलावा अनेकों चित्र श्रृंखलाओं का चित्रण किया है जिसमें भारत के सभी प्रधानमंत्री, उत्तर प्रदेश के सभी मुख्यमंत्री, भारत के सभी राष्ट्रपति, भारत रत्न से सभी व्यक्ति, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, परम वीर चक्र विजेता, नोबेल विजेता भारतीय,भारतीय कवि,आदि प्रमुख है, जो इनकी रचनात्मक सक्रियता और कला के व्यापक सामाजिक दृष्टिकोण को दर्शाती है। चन्द्र प्रकाश अपनी कला कुशलता के दम अनेकों बार राष्ट्रीय स्तर सम्मानित हुए हैं। सन् 2011 राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन अयोध्या द्वारा सम्मानित, 2012 राज्य स्तरीय चित्रकला प्रदर्शनी अंबेडकरनगर में किशन सोनी द्वारा सम्मानित,2013 श्री राम कथा विषय पर उत्कृष्ट चित्रांकन के लिए सीओ बीकापुर तारकेश्वर पांडेय द्वारा सम्मानित, 2014 राष्ट्रीय कला मेला अंबेडकरनगर में विश्व की प्रथम महिला कला डिलीट प्रो० चित्रलेखा सिंह द्वारा सम्मानित,2019 राष्ट्रीय चित्रकला प्रदर्शनी डॉ राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय अयोध्या में राष्ट्रीय श्रेष्ठ कलाकार सम्मान से सम्मानित, 2020 रेड रूबी आर्ट अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में इंटरनेशनल गोल्डन आर्ट अवार्ड से सम्मानित, 2021 शांती फाउंडेशन गोंडा द्वारा सावित्री बाई फूले सम्मान से सम्मानित,2022 स्वामी विवेकानन्द सम्मान से सम्मानित,2023 सरदार पटेल स्मारक संस्थान बस्ती द्वारा राष्ट्रीय गौरव सम्मान से सम्मानित,2024 अंतर्राष्ट्रीय श्रीराम कथा चित्रकला प्रदर्शनी अयोध्या में सम्मानित,2025 भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा सम्मानित।
चन्द्र प्रकाश को 16 वर्षों की चित्रकारी की साधना ने इन्हें मुकाम दिया है। चित्रकला प्रदर्शनियों में इनकी चित्रकारी न सिर्फ सराही गई है, बल्कि इस हुनर बाज की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान भी हुई है। चन्द्र प्रकाश चौधरी ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़े पूर्वांचल के प्रसिद्ध युवा चित्रकारों में से एक हैं। जिन्होंने चित्रकला में अपने व्यापक कौशल के माध्यम से बस्ती जनपद को राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया है।

शनिवार, 15 अगस्त 2026

रानी तलाश कुंवरि / Rani Talash Kuwari


🚩 महारानी तलाश कुंवरि 🛡🗡 🏹

अमोढ़ा के नरेश पृथा सिंह के बाद उनके बड़े पुत्र राजा अभय सिंह तथा उनके बाद उनके पुत्र राजा जंगबहादुर सिंह ने अमोढ़ा का शासन सम्भाला उनका विवाह अंगोरी राज्य (राजाबाजार, ढ़कवा)के दुर्गवंशी राजकुल की राजकुमारी तलाशकुँवरी के साथ हुआ था।उन्हें भी राजकुमारों की तरह शस्त्र चलाने की शिक्षा दी गई थी।भाला,तलवारबाजी घुड़सवारी तीरंदाज़ी आदि शस्त्र कला में रानी बचपन से ही प्रवीण थीं।

सब कुछ ठीक चल रहा था तभी सन 1853 में राजा जंगबहादुर सिंह का निःसंतान निधन हो गया, तब परिस्थिति वश रानी तलाशकुवंरि ने अमोढ़ा की राजगद्दी संभाली। सत्ता सम्भाले हुए ४ वर्ष भी पूरे नहीं हुए थे, तभी १८५७ का स्वतंत्रता आंदोलन शुरू हो गया। रानी तलाशकुँवरि भी झांसी की रानी की तरह निसंतान थीं, तथा गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी की कुख्यात ‘डाक्ट्रिन ऑफ लैप्स’ पॉलिसी यानी की(निःसंतान राजपरिवारों का राज्य ईस्ट इंडिया कम्पनी में मिला लेना) के सीधे निशाने पर थीं। 
1857 में अवध के बाकी हिस्सों में बगावत के शोले भड़ककर बुझ गए तो भी रानी तलाशकुंवरी ने अंग्रेजों की अधीनता या पराजय स्वीकार करना गवारा नहीं किया।अंग्रेजों ने उनके शासन के दौरान कई तरह की दिक्कतें खड़ी करने की कोशिश की,पर स्वाभिमानी रानी ने हर मोरचे का मुकाबला किया। 

                   
                   (रानी तलाश कुंवरि )

रानी ने अपने प्रमुख रणनीतिकारों के साथ बैठके की और फैसला किया कि अंग्रेजों को भारत से खदेडऩे में स्थानीय क्षत्रियों,किसानों तथा पठानो इत्यादि लड़ाकों की मदद से एक बड़ी सेना का संगठन किया जाय।और अंग्रेजो का जी जान से मुक़ाबला किया जाय।

इस प्रकार क्षेत्रीय जनों की एक बड़ी सेना बनाकर रानी ने उन्हें युद्ध नीति का प्रशिक्षण स्वयं दिया,और युद्ध का बिगुल फूंक दिया गया। रानी की सेना ने बस्ती-फैजाबाद के सड़क और जल परिवहन को ठप्प करा दिया था। संचार के सारे तार टूट जाने से अंग्रेज बुरी तरह बौखला गए। रानी अंग्रेजों के आंखों की किरकिरी पहले से ही बन गयीं थी।उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई की तरह मर्दाना वेश में लड़कर अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए और सैन्य व्यूह रचना में अपनी सिद्धहस्तता भी प्रमाणित किया। विपरीत परिस्थिति और सीमित संसाधन के बावजूद उन्होंने अपने साहस,शौर्य और रणकौशल की बदौलत  अंग्रेजों से १० महीने तक युद्ध किया।और उनकी सेना ने कई अंग्रेज अधिकारियों और सैनिकों को मौत के घाट उतारा।

पखेरवा के पास हुए मुकाबले में उनका प्यारा घोड़ा घायल होकर मर गया।पराजय सामने खड़ी देखकर भी उनका मनोबल कम नहीं हुआ। किंचित भी घबराए बिना उन्होंने अपने सैनिकों से कहा,’अंग्रेज मुझे हर हाल में जिंदा या मुर्दा पकड़ना चाहते हैं। मैंने भी तय कर लिया है, कि अगर इसकी नौबत आई,तो मैं अपनी ही कटार से अपनी जीवनलीला समाप्त कर लूंगी। आप लोग मेरे मरने के बाद भी जंग जारी रखना तथा मेरी लाश फिरंगियों के हाथ न पड़ने देना।

2 मार्च, 1858 को बुरी तरह घिर जाने पर रानी ने जो कहा था, कर दिखाया। अपनी ही कटार खुद को मार ली। उनके वफादार सैनिकों ने जान पर खेलकर उनकी लाश अंग्रेजों के हाथ न पड़ने देने का वादा निभाया। रानी की मौत बाद उनके शव को सहयोगियों ने छिपा लिया। बाद में शव को अमोढा राज्य की कुल देवी समय माता भवानी का चौरा के पास दफना दिए। और वहां पर मिट्टी का एक टीला बना दिया। यह जगह रानी चौरा के नाम से ही मशहूर है। पखेरवा में जहां रानी का घोड़ा मर गया था,उसे भी स्थानीय ग्रामीणों ने वहीं दफना दिया। इस जगह पर एक पीपल का पेड़ आज भी मौजूद है। यहाँ के लोगों के लिए यह जगह श्रद्धा का केन्द्र है।
 
    (महारानी तलाश कुंवरि जी के किले के ध्वंसावशेष)  


मगर पूर्वाग्रही और खिसियाए अंग्रेजों ने तोप लगाकर अमोढ़ा क़िले को,सुंदर राजभवन से खंडहर में तब्दील कर दिया उनका महल और किले के खंडहर आज भी उनके साहस,शौर्य,वीरता और शहादत की कहानी बयां करते हैं।

अंग्रेजो ने इस इलाके में भयानक नरसंहार किया अमोढ़ा का विध्वंस करने के पश्चात रानी अमोढ़ा,राजा नगर और राजा सत्तासी (गोरखपुर) की सारी संपत्ति बस्ती और बांसी राजा को अंग्रेजों के प्रति उनके वफ़ादारी के इनाम स्वरूप दे दी।
साभार 
सोसल मीडिया 

राजा शिवगुलाम सिंह / Raja Shiv Gulam Singh

आजादी के महानायक राजा शिवगुलाम सिंह जी का एक संक्षिप्त परिचय ।


1857 क्रान्ति के नायक / बस्ती /उत्तर प्रदेश

        (राजा शिव गुलाम सिंह जी का चित्र) 

सन 1857 ई०वी० प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन मे अंग्रेजो के दांत खट्टे करने वाले स्वतंत्रता आंदोलन के नायक राजा दौलत सिंह के पुत्र राजा शिव गुलाम सिंह के किले के ध्वंसावशेष मात्र अब रह गये है । राजा शिवगुलाम सिंह ने अकेले ही अंग्रेजों सेना से लोहा लेते हुए उनके दांत खट्टे कर दिए थे। और उन्होंने अकेले ही सैकड़ो अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया था। लेकिन अंग्रेजों ने धोखे से उनकी हत्या कर दी। इसके बाद वह  उनका सिर काटकर ले गए, और वह सिर आज भी कोलकात्ता के म्यूजियम में रखा हुआ है। 


 बस्ती के रूधौली क्षेत्र के 70 गांव की रियासत संभालने वाले दौलत सिंह के 23 वर्षीय बड़े पुत्र शिव गुलाम सिंह में 1857 के आजादी के जंग की आग धधक उठी थी. उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत से देश को आजाद कराने की ठान ली. छोटी सी उम्र में ही उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंक दिया. अपने रियासत के नवजवानों को इकठ्ठा कर सेना बनाना शुरू कर दिया. हालांकि शिव गुलाम सिंह के पास अंग्रेज की बड़ी सेना से सीधा मुकाबला करने के लिए संसाधन की कमी थी. लिहाजा उन्होंने गुरिल्ला युद्ध करने का प्लान बनाया और उसके लिए अपने सैनिकों को ट्रेनिंग भी दी. गुरिल्ला युद्ध के सहारे उन्होंने दर्जनों अंग्रेजी अफसरों को मार गिराया. जिससे वो अंग्रेजी हुकूमत के आंखो की किरकिरी बन गए.

शिव गुलाम सिंह तलवार चलाने की कला में निपुण थे. उनको दोनों हाथों से निपुणता से तलवार चलाने में महारथ हासिल थी. शिव गुलाम सिंह की शहादत स्थल बस्ती जिले के रूधौली तहसील के पैडा चौराहे पर उनकी याद में प्रतीक चिन्ह और पार्क बना हुआ है. बता दें कि शिव गुलाम सिंह के तीन और भाई थे. शिव बक्श सिंह, जीत सिंह व रंगा सिंह, जिसमें उनके तीसरे नंबर के भाई शिवबक्श सिंह की असमय मृत्यु हो गई थी. वहीं बाकी दोनों भाइयों जीत सिंह और रंगा सिंह को अंग्रेजों ने मारकर उनकी रियासत छीन ली. इसके बाद भी शिव गुलाम सिंह पीछे नहीं हटे और अंग्रेजी हुकूमत से अपनी लड़ाई जारी रखी व गुरिल्ला युद्ध के माध्यम से अंग्रेज अधिकारियों व सैनिकों को मारते रहे.

                राजा शिव गुलाम सिंह का किला 

अंग्रेज चाल चलकर शिव गुलाम सिंह के कुछ करीबी और विश्वासपात्र लोगों को अपने साथ मिला लिया. उन्हीं के माध्यम से शिव गुलाम सिंह को सूचना पहुंचाई की अंग्रेजी हुकूमत के कुछ अधिकारी पैडा में आ रहे हैं, उर्दू में भेजे गए इस संदेश में चाल चली गई. जिससे शिव गुलाम सिंह की सेना भानपुर तहसील के बैड़वा पहुंच गई और शिव गुलाम सिंह अपने मात्र चार सिपाहियों के साथ पैडा पहुंचे. जहा अंग्रेजों के साथ हुए युद्ध में उनको शहादत मिली.

अंग्रेज शहीद शिव गुलाम सिंह को जिंदा पकड़ना चाहते थे. कारण अंग्रेजों ने पहले उनके पैर पर बीस से अधिक गोलियां मारी. फिर भी महान क्रांतकारी शहीद शिव गुलाम सिंह जमीन पर बैठकर ही दोनों हाथों से तलवार चलाते रहे. दर्जनों अंग्रेज सैनिकों का सर धड़ से अलग कर दिए. घबराकर अंग्रेजों को उनके सीने में गोली मारनी पड़ी लड़ाई में राजा के हाथी ने भी खूब कमाल दिखाया, मरने से पहले हाथी सैकड़ों अंग्रेजी सेना को अपने पैर से कुचलकर मार दिया। जब राजा शहीद हो गए, तो अंग्रेजों ने बर्बरता दिखाते हुए राजा सिर काटकर ले गए।

आजादी के महानायक राजा शिव गुलाम सिंह जी का बस्ती के चित्रकार चंद्रप्रकाश चौधरी ने सजीव चित्रण भी किया है

शहीद राजा की याद में दिवाकर विक्रम सिंह और क्षेत्र के कुछ सम्मानित लोगों ने मिलकर पूर्व माध्यमिक विधालय पर एक स्मारक का निर्माण कराया। आज भी राजा और उनकी हाथी की गाथा सुनाई जाती है। पैड़ा में भी पर्यटन विभाग की ओर से स्मारक बनाया गया। राजा के परिवार के कुछ लोग आज भी रुधौली और कनाडा में रहते है।



उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के रुधौली क्षेत्र में स्थित बरगदवा जागीर (पैंड़ा) के शहीद राजा शिव गुलाम सिंह जी का किला भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (1857 की क्रांति) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक प्रतीक है। राजा शिव गुलाम सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ लोहा लेते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी, जिसके कारण उनके इस किले को इतिहास में 'शहीद राजा शिव गुलाम सिंह का किला' कहा जाता है।

चित्रकार चन्द्र प्रकाश चौधरी द्वारा इस ऐतिहासिक धरोहर और उनके गौरवमयी इतिहास को सहेजने, पुनर्जीवित करने और जन-जन तक पहुँचाने के लिए इस किले का रेखाचित्र/चित्र तैयार करवाया गया है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इस बलिदान से प्रेरणा ले सकें।

साभार 

शोसल मीडिया 

गुरुवार, 13 अगस्त 2026

अमोढ़ा रियासत के किले की चन्द्र प्रकाश चौधरी ने बनाई खूबसूरत पेंटिंग

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के हर्रैया क्षेत्र में स्थित अमोढ़ा रियासत की महारानी तलाश कुंवरि जी 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की एक प्रमुख वीरांगना थीं। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ अमोढ़ा रियासत की सेना का नेतृत्व करते हुए अभूतपूर्व साहस और शौर्य का परिचय दिया था।

अमोढ़ा रियासत, रानी तलाश कुंवरि के किला का चित्रकार चन्द्र प्रकाश चौधरी द्वारा बनाई गई पेंटिंग 

स्थानीय कला एवं संस्कृति को संजोने वाले चित्रकार चन्द्र प्रकाश चौधरी (बस्ती, उ.प्र.) द्वारा महारानी तलाश कुंवरि जी के ऐतिहासिक व्यक्तित्व, उनके शौर्य और अमोढ़ा रियासत के ऐतिहासिक संदर्भों पर आधारित कलाकृतियों व चित्रों का अंकन किया गया है।


इन कलाकृतियों में महारानी तलाश कुंवरि के अमोढ़ा रियासत से जुड़े ऐतिहासिक इतिहास, वीरांगना के रूप में उनके अदम्य साहस और उनके किले/रियासत की ऐतिहासिक विरासत को तूलिका के माध्यम से जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया है।

रविवार, 31 मई 2026

जीवन परिचय चित्रकार चन्द्र प्रकाश चौधरी


            (चन्द्र प्रकाश चौधरी )


                संक्षिप्त जीवन परिचय -चित्रकार चन्द्र प्रकाश चौधरी
               
चन्द्र प्रकाश चौधरी का जन्म सन् 1990 उत्तर भारत के एक हिन्दू कुर्मी परिवार में हुआ था। इनका मूल जन्म निवास स्थान गांव खजुहा है । चित्रकार चन्द्र प्रकाश चौधरी एक किसान परिवार से है इनका वर्तमान निवास स्थान बैदोलिया अजायब है, जो बस्ती जिले में भगवान श्री राम के पवित्र जन्मस्थान और पौराणिक नगरी अयोध्या धाम से 55 किलोमीटर पूर्वोउत्तर में स्थित है। इनके पिता श्री राम दुलारे चौधरी एक मध्यम वर्गीय किसान है जो कि अपना कृषि का व्यवसाय कर रहे है, व  इनकी माता श्रीमती मालती चौधरी एक धार्मिक महिला है ये अपने चार भाईयो ( विक्रमा जीत चौधरी, कृष्ण कुमार चौधरी,रामानंद चौधरी ) मे से तीसरे है ।
  बेहद सरल स्वाभाव व मृदुभाषी चित्रकार चन्द्र प्रकाश चौधरी इन्होने गांव की प्राथमिक पाठशाला बैदोलिया अजायब, गौर, बस्ती से अपनी आरंभिक शिक्षा ली, और सन 2005 मे आदर्श जनता उ०मा० हलुआ,बस्ती से हाईस्कूल व 2007 में हंसराज लाल इण्टर कालेज गनेशपुर, बस्ती से इण्टरमीडियट की परीक्षाये प्रथम श्रेणीयों मे उत्तीर्ण किया |

सन् 2007 मे उच्च शिक्षा के लिए पूर्वांचल के सुप्रसिध्द महाविद्यालय फैजाबाद जिले के साकेत पी.जी.कालेज मे दाखिला लिया और वही से इन्होने सन 2010 मे चित्रकला,शिक्षाशात्र,समाजशात्र विषय के साथ बी.ए. व सन 2012 मे चित्रकला विषय के साथ एम.ए.की परीक्षायें प्रथम श्रेणीयो मे उत्तीर्ण किया |
 पूर्वांचल यूपी के एक प्रसिद्ध डिग्री कॉलेज अपनी परास्नातक स्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह सन 2012 में कला पेशेवर अध्ययन के लिए देश के विविध संस्थानो से जुड़ कर चित्रकला का गहन अध्ययन किया और अपने जन्मजात कलात्मक गुणों के साथ उन्होंने कला के क्षेत्र मे प्रवेश किया ।
इसी दौरान इनकी मुलाकात जाने माने योग साधक व कला अाचार्य महेश योगी जी से हुई, और ऐ इन्ही को अपना कला व आदर्श मानकर उनके कला संस्थान ( सप्तरंग ललित कला संस्थान, अयोध्या ) मे प्रवेश लिया और महेश जी की सरण स्थली मे रह कर कला की साधना करने लगे | जिससे इनकी कला दिनो दिन. निखरती चली गयी | इसी बीच इन्हे राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन फैजाबाद द्वारा सम्मानित किया गया | फिर इन्होने सन 2011 मे अपने गृह जनपद बस्ती मे एकल चित्रकला प्रदर्शनी का आयोजन कर अपनी कला प्रतिभा का लोहा मनवाया, जिसकी जनमानस मे मुक्त कंठ से प्रशंसा की गयी | इसके बाद इनकी सफलताओ का जो दौर चला वह कभी नही थमा, इन्होने राज्य ललित कला अकादमी लखनऊ, के साथ साथ अलीगढ मुस्लिम विश्व विद्यालय, फैजाबाद, सुलतानपुर, अयोध्या , मनवर महोत्सव हर्रैया, बस्ती, अम्बेडकर नगर, कप्तानगंज आदि प्रदेश के विविध स्थानो व जनपदो मे अपने चित्र कृतियो का प्रदर्शन कर अपनी कला प्रतिभा का परिचय दिया | सन 2012 राज्यस्तरीय चित्रकला प्रदर्शनी देव इन्द्रावती पी.जी.कालेज कटहरी, अम्बेडकर नगर मे इन्हे "फस्ट एण्ड लास्ट" नामक चित्रकृती के लिए सुप्रसिध्द अन्तर राष्ट्रीय चित्रकार किशन सोनीजी द्वारा सम्मानित किया | 

चन्द्र प्रकाश चौधरी ने विविध माध्यमो से चित्रो की रचना की है जिनमे आयल, जल, क्रेयान, पेन्सिल स्केज प्रमुख है | मित्रो साल 2013 मे इन्हे रामकथा पर उत्कृष्ट चित्राकंन के तत्कालीन सी.ओ. बीकापुर तारकेश्वर पाण्डेय जी द्वारा सम्मानित किया गया व 2014 मे क्षेत्रीय कला मेला सुलतान पुर मे सुप्रसिध्द लोक विधा की चित्रकत्री डा. कुमुद सिंह जी सम्मानित किया गया | और इसी वर्ष इन्हे राष्ट्रीय कला मेला मे "दा फ्यूचर नामक कला कृति लिए विश्व की प्रथम महिला कला डी.लिट. प्रो.चित्रलेखा सिंह जी द्वारा सम्मानित किया गया | कला के साथ साथ बहुमुखी प्रतिभा के धनी चौधरी साहब को वाद विवाद, आशु भाषण, क्राफ्ट कला, आदि प्रतियोगिताओ मे प्रथम पुरस्कारो से सम्मानित होकर अपने जिले व क्षेत्र का नाम ऱोशन कर चुके है |


कलाकारी के साथ ही साथ चन्द्र प्रकाश चौधरी ने लेखन कार्यो मे भी अपनी दक्षता का परिचय दिया है बेहतरीन लेख व प्रभाव पूर्ण संवादो के दम पर इनकी रचनाये व लेख समाचार पत्रो मे अपना विशिष्ठ स्थान बना चुकी है |
महज 24 वर्ष मे उम्र मे ही इन्होने अपने कला गुरू महेश त्रिपाठी के जीवन लीला पर आधारित एक ग्रंथ की रचना की है जिसकी देश अनेको कलाविदो व लेखको ने मुक्त कंठ से सराहना की है |
इतना ही नही इन्होने इण्टर मीडिएट के विद्यार्थियो व कला पाठको के लिए, सन 2017 में "NATURE DRAWING" (प्रकृति चित्रण - पुष्प चित्रण) नामक पुस्तक का सृजन कर कला के विद्यार्थियो को एक कला सीखने का शसक्त मार्ग प्रसस्त किया । पुस्तक का यह संस्करण अध्येताओ की कलात्मक रूचि का विकास करेगा और किशोर कलाकारो की प्रतिभा के विकास को बहुमुखी आयाम देगा,एेसा इनका दृढ़ विश्वास है ।
 इन्होने सन 2017 मे एक फिर अपने गृह जनपद चित्रकला प्रद्रर्शनी का आयोजन कर जनमानस कला का प्रसार किया और इसी वर्ष इन्हे बस्ती जिले लोक प्रिय नेता पूर्व विधायक राना कृष्ण किंकर सिंह जी द्वारा सम्मानित किया गया ।
चन्द्र प्रकाश चौधरी द्वारा सृजित चित्र देश कई संग्रहालयो मे संग्रहित है और बस्ती जनपद के प्रमुख नेताओ जैसे राना कृष्ण किंकर सिंह, राम प्रसाद चौधरी, सी.ए.चंद्र प्रकाश शुक्ल आदि के निजी संग्रह मे सुसजित है
समाज सेवा मे भी कभी ए पीछे नही रहे ये स्काउट गाइड, रेडक्रास जैसी समाज सेवी संगठनो से जुड़े रहे है ।  ग्रामीण अंचल मे कला शिक्षा को लेकर इन्होने समय समय पर नि: शुल्क चित्रकला प्रशिक्षण शिविरो का व चित्रकला प्रतियोगिताओ आयोजन करते रहे है | अपनी प्रभाव चित्रकारी, लेखनी,व ओजपूर्ण संवादो से नित नित लोगो के दिलो दिमाग मे छाप छोड़ रहे युवा चित्रकार ने ग्रामीण गरीबों के बच्चो को मुफ्त मे शिक्षा व पाठ्य समाग्री वितरण आयोजन किया ।

चित्रकार चन्द्र प्रकाश चौधरी के पिता राम दुलारे चौधरी जी ।

प्रचार प्रसार से दूर सर्वथा दूर रहकर एकान्त  कला साधना के अभ्यासी युवा चित्रकार चन्द्र प्रकाश चौधरी जी ने अपने अल्पकाल मे अथक साधना की है ! भीड़ भाड़  और कोलाहल इन्हें कभी अभीष्ट नही रहे है । यही कारण है कि शहरो को छोड़ उन्होने ग्राम अंचल मे कला की दीर्घ साधना कर रहे है । कर्तव्य-पालन सबसे बड़ी ईश वन्दना है, इस सिध्दान्त का अक्षरत पालन करते हुए उन्होने कला अध्यापक से कला प्रवक्ता पद की गरिमा को निरन्तर बढा रहे है ।

इनकी कला साधना सदैव प्रशंसा की पात्र रही है । उनकी तूलिका ने न केवल मानव संवेगो और संवेदनाओ को आकार दिया है अपितु प्रकृति के विभिन्न रम्यरूपो को सजीवता के साथ साकार किया है । साथ ही ग्रामीण और शहरी गरीब बच्चों को बुनियादी शिक्षा प्रदान करने के लिए ये वर्तमान समय मे गृह जनपद बस्ती मे विविध स्कूलो व संस्थाओ से जुड़कर नव निहालो मे कला की अलख जगा रहे है |

मरकाहे चौधरी का जीवन परिचय । Markahe Chaudhary Biography

 24 दिसंबर सन 1958 बस्ती जनपद के कप्तानगंज विधानसभा के समीप स्थित ग्राम सभा महुआ मिश्र के ग्राम खजुहा में मध्यमवर्गीय किसान परिवार सद्दर चौधरी व लाली देवी के चौथी संतान के रूप में जन्मे मन्नू चौधरी (मरकाहे) के कुल 4 भाई और एक बहन है। आपकी माता श्रीमती लाली देवी करुण हृदया सुरूचि संपन्ना एवं धार्मिक महिला थी। ये अपना अधिक समय घरेलू कार्य एवं धार्मिक कार्यों में बिताती थी, मां के धार्मिक विचारों के पूर्ण झलक आप में दिखाई पड़ते हैं।

                 मरकाहे चौधरी 

                     
                     मरकाहे चौधरी 



अस्वस्थता के चलते इनके पिता अल्पआयु में ही स्वर्ग सिधार गए थे । घर की पूरी जिम्मेदारी इनकी माताजी के कंधों पर थी । जिन्होंने अपने दायित्वों कर्तव्यो का निर्वहन करते हुए अपनी संतानों का पालन पोषण किया। पारिवारिक विषम परिस्थितियों के कारण केवल प्राथमिक स्तर तक की ही शिक्षा प्राप्त कर पाए हैं।
घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण 11 अप्रैल सन 1967  में अपनी मौसी के घर खिरिहवा निवास करने के लिए चले आये। और वही खेती किसानी में अपने मौसा का हाथ बटाने लगे, यहां 21 वर्षो तक रहे । समय के साथ अपने आप को बदलते हुए बैलगाड़ी चलाना सीखना शुरू कर दिये जो जसईपुर कप्तानगंज तक का सफर तय किया करते थें।

परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए 10 मार्च सन 1977 को गोरखपुर से बनारस होते हुए आप मिर्जापुर पहुंचे, जहां जेपी सीमेंट फैक्ट्री में 11 माह तक कार्यरत रहे, यहां रहते हुए धार्मिक कार्यों में भी अपनी विशेष रूचि बनाए रखें।

11 फरवरी सन 1978 को मिर्जापुर से वापस आने के बाद 21 अक्टूबर सन 1978 फैजाबाद से ट्रेन का सफर करते हुए दिल्ली पहुंचे, वहां एक गोदाम मे काम करने लगे। इनका मन यहां भी नही लगा गांव के मिट्टी की खुशबू पुनः इन्हे 18 नवम्बर सन 1978 महज 27 दिन बाद अपने ओर खीच ले आयी।

इसी दौरान आप वैवाहिक परिणय सूत्र के बंधन में बंधे लेकिन समय को शायद यह मंजूर नहीं था, कुछ दिनों उपरांत आप दोनो लोग एक दूसरे से अलग हो गए और नितांत एकांत जीवन व्यतीत कर रहे हैं । कोई सोच भी नहीं सकता था कि एक किसान परिवार में एक ऐसे व्यक्ति का उदय हो रहा है जो आगे चलकर समाज सेवा की एक मिसाल बनेगा ।

 02 अगस्त सन 1985 अपनी माता की मृत्यु के पश्चात बैदोंलिया अजायब मैं अंतिम संस्कार में पहुंचे जहां वे अपने सबसे छोटे पुत्र राम दुलारे चौधरी के साथ रहा करती थी। मृत्यु भोज समाप्त होने के उपरांत आपके छोटे भाई द्वारा बैदोलिया अजायब में ही रहने के लिए आग्रह किया गया, सोच विचार के बाद आपने स्वीकार किया और घर की बागडोर अपने हाथ में ले लिये। दिन रात अथक परिश्रम करते हुए,आपके कुशल नेतृत्व में मकान बना,तथा प्राचीन परंपरा से चली आ रही कृषि पद्धति से दूर हटकर कृषि में आधुनिक कृषियंत्रों का प्रयोग करने की और अधिक जोर दिया, और सन 2000 में कृषि कार्यों के लिए एक ट्रैक्टर खरीदा, जिससे कृषि का कार्य और अधिक सुगम हुआ।

 आप एक अच्छे वक्ता एवं हास्य व्यंगकार भी हैं, अत्यंत सरल एवं सोम्य एवं धार्मिक विचार होने के कारण  देशाटन तीर्थाटन आदि में इनका विशेष लगाव रहा है ।  समय समय पर देशाटन एवं तीर्थाटन के लिए प्रवास भी करते रहे हैं, अयोध्या, विध्यांचल, काशी, देवीपाटन इनके प्रमुख दर्शन के केन्द्र रहे है । 

संपूर्ण जनमानस में लोग इन्हे "मरकाहे "नाम से जानते व पहिचानते हैं लेकिन इनका वास्तविक नाम मुन्नू चौधरी है । इन्होने अपने छोटे भाई का एक कुशल पथ प्रदर्शक के रूप में सदैव मार्गदर्शन किया, आप दोनों भाइयों को देखने से ऐसा एहसास होता है कि आप दोनो लोगो में काफी गहरी मित्रता हो, इतने घुलमिल मिलकर रहने के बावजूद भी छोटे-बड़े के संस्कार झलक जाते हैं। माता-पिता की आदर्शवादी विचारों का प्रभाव तथा कुशल प्रयासों से यह निरंतर आगे बढ़ते गए इन्होंने अभी तक अपने जीवन काल में समाज सेवा के कार्यो के लिए हार नहीं मानी है । 

आप युवाअवस्था से राजनिति मे भी विशेष से सक्रिय रहे हैं, चौधरी चरण सिंह, डॉ राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, एवं किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैट के विचारो से अत्यधिक प्रभावित रहे ।ग्राम पंचायत स्तर की राजनीति मे भी अपनी दावेदारी ठोक दी लेकिन सहयोगियो के भीतरघात करने के कारण दूसरे पायदान पर रहे। बाद में ग्राम पंचायत के सदस्य मनोनीत किए गए।  क्षेत्र की राजनीति के चाणक्य के रूप में भी जाने जाते है । कई बार इनका विवादो में भी नाम आया लेंकिन अपनी बेदाग छवि को बनाये रखने कामयाब रहे, और सिद्धांतवादी राजनीति में सक्रिय है।

इनकी भावना है कि हमारे देश की उत्तम संस्कृति एवं सभ्यता को हर एक व्यक्ति पूर्ण रूप से समझ सके, तथा उसका अनुसरण कर सके, इन्होंने अनेको धार्मिक कार्यक्रमों में सहभागिता के साथ-साथ मूर्ति सृजन के कार्यों में भी अपनी कुशलता दिखाई है । विद्यालयों पर आयोजित समारोह एवं राष्ट्रीय पर्वो में निरंतर शिरकत करते रहे हैं। गांव की हरियाली लहलहाती फसलों की खनक, पीपल की छांव माटी की महक आपके विचारों में नितांत झलकता रहता है।

 

आपकी सेवा भावना नदियों की भांति प्रवाहित होकर सदैव एक नए मार्ग प्रशस्त करती रहती है,आपकी सरसता विनम्रता सेवाभावना लोगों के मन मस्तिष्क के अंतरात्मा को स्पर्श कर शीतलता प्रदान करती है, क्षेत्र में मरकाहे चौधरी नाम आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है ।

आपका का प्रमुख उद्देश्य रहा है कि देश के युवाओं में राष्ट्रप्रेम सांप्रदायिक सद्भाव के साथ साथ समाज सेवा की भावनाओं का भी पूर्ण रूप से विकास हो, जिससे हमारा देश एक उत्तम संस्कृत को लेकर विश्व के मरुस्थल पर अनंत काल तक अपने अस्तित्व को कायम रख सके, आपने इन्हीं उद्देश्यों को पूरा करने के लिए देश व समाज के अनेको परिवारों को आश्रय एवं सहायता प्रदान कर रहे है।


आप सहज सरल और निर्भिमानी लोगों में से हैं जो धन और यश का मोह त्याग कर सच्चे मन से समाज सेवा करने हेतू निरंतर प्रयासरत हैं । 


(15/05/2023 साक्षात्कार व अभिलेखों से व्यक्तिगत जीवन के बारे में जानकारी प्राप्त हुई है)

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

बच्चों का चित्रकार चन्द्र प्रकाश चौधरी के प्रति स्नेह

बच्चों का चित्रकार (चन्द्र प्रकाश चौधरी) के प्रति स्नेह उनके सरल, निश्छल और कल्पनाशील व्यक्तित्व से उपजा है। बच्चे चित्रकारी के माध्यम से अपनी भावनाओं को रंगीन और रचनात्मक रूप से व्यक्त करते हैं। चित्रकार उन बच्चों की भावनाओं को समझते हैं, उन्हें स्वतंत्रता देते हैं और उनकी रचनात्मकता को प्रोत्साहित करते हैं बच्चे अपनी खुशी, उदासी, और शरारत को रंग और चित्रों के माध्यम से व्यक्त करते हैं। जो कलाकार उनकी इस 'भाषाहहीन' अभिव्यक्ति को समझकर प्रोत्साहित करते हैं, जिससे वे जन प्रिय बन जाते हैं।